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आज भी साक्षात विष्णु के सुदर्शन चक्र के होते हैं दर्शन

मान्यता है कि जब जब पृथ्वी पर कोई संकट आता है तो भगवान अवतार लेकर उस संकट को दूर करते हैं। भगवान विष्णु ने अनेकों बार पृथ्वी पर अवतार लिया है। पद्म पुराण के उत्तरखण्ड में वर्णन है कि भगवान श्री विष्णु ही परमार्थ तत्त्व हैं। वे ही ब्रह्मा और शिव सहित समस्त सृष्टि के आदि कारण हैं। वे ही नारायण, वासुदेव, परमात्मा, अच्युत, कृष्ण, शाश्वत, शिव, ईश्वर तथा हिरण्यगर्भ आदि अनेक नामों से पुकारे जाते हैं। नर अर्थात जीवों के समुदाय को नार कहते हैं। प्रेम सुखसागर धर्मशास्त्र के अनुसार भगवान विष्णु के 24 अवतार हुए हैं। हम अपने पाठकों को इस लेख के माध्यम से भगवान विष्णु के 24 अवतारों में से पहले अवतार श्री सनकादि मुनि के बारे में बता रहे हैं। हिन्दू धर्म ग्रंथ की पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सृष्टि के आरंभ में लोक पितामह ब्रह्मा ने अनेक लोकों की रचना करने की इच्छा से घोर तपस्या की। उनके तप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने तप अर्थ वाले सन नाम से युक्त होकर सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार नाम के चार मुनियों के रूप में अवतार लिया। श्री सनकादि मुनि विष्णु के प्रथम चार अवतारों के लिए प्रयुक्त शब्द है। ये चारों प्राकट्य काल से ही मोक्ष मार्ग परायण, ध्यान में तल्लीन रहने वाले, नित्यसिद्ध एवं नित्य विरक्त थे। ये भगवान विष्णु के सर्वप्रथम अवतार माने जाते हैं।सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार ऋषियों ने ब्रह्माजी से सर्वप्रथम \'परम शक्ति\' के विषय में प्रश्न किया। ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु के स्वरुप वासुदेव कृष्ण को जगदीश्वर कहकर संबोधित किया। सनकादि ऋषियों द्वारा पूछ जाने पर ब्रह्मा जी उन्हें बताते हैं कि वृन्दावन अधीश्वर श्री कृष्ण ही एकमात्र सर्वेश्वर हैं। वे समस्त जगत के आधार हैं। वे प्रकृति से परे और नित्य हैं। उस सर्वेश्वर श्री कृष्ण की आह्लादिनी, सन्धिनी, ज्ञान इच्छा, क्रिया आदि अनेक शक्तियां हैं। उनमें आह्लादिनी सबसे प्रमुख है।आज भी इस घोर कलियुग में सनकादिक मुनियों का एक सम्प्रदाय विधमान है। इस संप्रदाय को \'निम्बार्क संप्रदाय\' अथवा \'सनकादि संप्रदाय\' कहा जाता है। मान्यता है कि सनकादि ऋषियों ने भगवान के हंसावतार से ब्रह्म ज्ञान की निगूढ़ शिक्षा ग्रहण करके उसका प्रथमोपदेश अपने शिष्य देवर्षि नारद को दिया था। इसके ऐतिहासिक प्रतिनिधि हुए निम्बार्काचार्य, इससे यह \'निम्बार्क संप्रदाय\' कहलाता है। आज भी आदि आवतार सनकादि मुनियों द्वारा प्राप्त लघुरूप \"सुदर्शन चक्र\" राजस्थान राज्य के अजमेर ज़िले के सलेमाबाद क्षेत्र में जगद्गुरु श्रीनिम्बार्काचार्यपीठ में दार्शनिक है।

News Posted on: 11-03-2015
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