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महिलाओं को बुढ़ापे में ये बातें ज्यादा देती हैं तकलीफ

बच्चे के जन्म से लेकर अपने जीवन के अंतिम पल तक मां उसकी परवरिश एवं जिम्मेदारियों से कभी मुंह नहीं मोड़ती, परंतु जिस बेेटे के लिए वह अपना हर सुख त्याग देती है कि वह बड़ा होकर उसके बुढ़ापे का सहारा बनेगा, वही बेटा जब मां को उसके बुढ़ापे में अकेला छोड़ कर अपनी गृहस्थी में रम जाता है, तो उसकी समझ में नहीं आता कि उसने तो बेटे के प्रति अपने फर्ज से कभी मुंह नहीं मोड़ा, उसकी खुशी में ही अपनी खुशी समझी, फिर क्यों वह मां को लाचार और बेबस समझ कर केवल घर का काम करने वाली या बच्चों की आया मात्र समझ रहा है ?
शादी के बाद बदलाव: बेटा बड़ा होकर जब कमाने लगता है तो मां उसकी शादी कर देती है और उसकी ख्वाहिश होती है कि अब वह अपनी बाकी जिंदगी आराम से गुजारे और बेटा-बहू उनकी सेवा करें परंतु अपनी अलग दुनिया बसाने और अपनी मर्जी से जिंदगी जीने की ललक में बेटे को मां फांस की तरह चुभने लगती है। पिता तो फिर अपना समय दोस्तों के साथ बाहर बिता लेता है, परंतु मां जो शुरू से घर की चारदीवारी में ही रहती आई है, उसे इस उम्र में भी घर में ही रहना भाता है। विडंबना तो तब आरंभ होती है जब अपना बच्चा होने पर उसे संभालने के लिए आया का खर्च उसकी जेब पर भारी पड़ता है और वह उस मां को घर ले आता है, जिससे वह मुंह मोड़ चुका है। मां भले ही पोते को पाकर सब भूल जाए,परंतु जरा सी चूक होने पर यह उलाहना सुनने को मिले कि आप से एक बच्चा तक संभाला नहीं जाता, मानो उसे तोड़ देते हैं। फिर भी मां को इस बात का एहसास शायद ही होता हो कि बेटे ने अपने स्वार्थ के लिए उसे आया बना दिया है।
तकलीफ देती बातें: उन महिलाओं को बुढ़ापे में ये बातें ज्यादा तकलीफ देती हैं, जो तलाकशुदा या विधवा हों क्योंकि अपना अकेलापन और बच्चों का ऐसा रवैया वह किसी से बांट भी नहीं सकतीं। यदि बेटा-बहू दोनों ही जॉब करते हों तो उस समय उसे बच्चे के साथ एक पल का आराम भी नहीं मिल पाता क्योंकि तब घर का काम भी उसे करना पड़ सकता है। यदि मां इस पर एतराज करती है तो बेटा-बहू या तो खुद घर छोड़ देते हैं या मां को छोडऩे पर मजबूर कर देते हैं । आखिर बदलते रिश्ते जन्म देने वाली मां को भीतर ही भीतर तोड़ देते हैं जबकि उन्हें उम्र की ढलती सांझ में उपेक्षित व्यवहार की नहीं, बल्कि प्यार और सहारे की जरूरत होती है ।

News Posted on: 18-06-2015
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