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आ रहा है मार्च, कर लीजिए तैयार कर छूट के कागजात

एक दूरसंचार कंपनी में काम करने वाले रवींद्र जोशी को फरवरी 2014 में अहसास हुआ कि आयकर छूट से जुड़े कागजात वक्त पर भेजना कितना जरूरी होता है। असल में वह इसमें ढिलाई बरत गए और उनके खाते में मासिक वेतन का महज 20 फीसदी हिस्सा आया। जोशी को शुरू में तो बड़ी हैरानी हुई और उन्होंने झटपट अकाउंट विभाग के प्रमुख से बात की। उसने उन्हें फौरन वजह बताईं - किराये भत्ते (एचआरए) का रजिस्टर्ड करार जमा नहीं कराया गया था, धारा 80 सी और चिकित्सा बीमा प्रीमियम से जुड़े कागजात भी गायब थे। इससे भी बुरी बात यह रही कि उन्होंने एलटीए की रकम तो पहले ही ले ली थी, लेकिन बिल अभी तक जमा नहीं कराए थे। जोशी का दिल यह सुनकर तो बिल्कुल बैठ गया कि अगले महीने भी उन्हें इतना ही वेतन मिलेगा क्योंकि कर अदायगी में जो भी कमी थी, उसे दो बराबर किस्तों में पूरा किया जा रहा है।
 घबराए जोशी को कर संबंधी सभी कागजात जुटाने के लिए दफ्तर से दो दिन की छुट्टïी लेनी पड़ी। लेकिन अब वह सबक ले चुके हैं। जोशी कहते हैं, 'मेरी मेज का एक कोना अब खाली रहता है, जहां कर से जुड़े कागजात ही रखे रहते हैं।' ज्यादातर कर्मचारियों को इसी तरह का झटका लगता है क्योंकि या तो उन्हें पूरी प्रक्रिया पता ही नहीं होती या वे आलस दिखा जाते हैं। अन्स्र्ट ऐंड यंग में कर विशेषज्ञ अमरपाल चड्ढïा कहते हैं, 'अगर कर्मचारी अपने नियोक्ता के पास निवेश के सबूत जमा नहीं कर पाता है तो नियोक्ता को वित्त वर्ष के आखिरी दो महीनों में अधिक कर काटना ही पड़ेगा।' वित्तीय योजनाकार गौरव मशरूवाला अपने ग्राहकों को यही सलाह देते हैं कि कर से संबंधित दस्तावेज मिलते ही उनकी छायाप्रतियां दफ्तर में जमा कर दी जाएं। वह कहते हैं, 'मैं उनसे जोर देकर कहता हूं कि दस्तावेज जमा करने के लिए 31 दिसंबर को आखिरी तारीख मानें क्योंकि बाद में उन्हें दिक्कत हो सकती है।' धारा-80सी  इसके तहत निवेश की सीमा बढ़ाकर 1.50 लाख रुपये कर दी गई है। अब कर्मचारियों को ध्यान रखना होगा कि अतिरिक्त 50,000 रुपये के निवेश के कागजात दफ्तर में सही वक्त पर जमा करा दिए जाएं। कई लोगों की तो इतनी रकम कर्मचारी भविष्य निधि में ही कट जाती है, जिसका हिसाब-किताब दफ्तर खुद रख लेता है। लेकिन अगर ऐसा नहीं होता है तो पक्का कर लीजिए कि आपने धारा-80सी के तहत छूट वाली किसी योजना में रकम लगाई है। उसके कागजात या म्युचुअल फंड के निवेश संबंधी जरूरी दस्तावेज दफ्तर में जमा करा दें। मकान किराया अगर आप किराये के मकान में रहते हैं, तो रजिस्टर्ड किरायानामा देना चाहिए, जो नगर पालिका में पंजीकृत हो और जिस पर आपका तथा मकान मालिक का पैन (स्थायी खाता संख्या) भी हो। दो साल पहले तक 1.80 लाख रुपये सालाना या 15,000 रुपये मासिक किराया नहीं होने पर करदाताओं को मकान मालिक का पैन नहीं देना पड़ता था। लेकिन बाद में आयकर विभाग ने 1 लाख रुपये सालाना या 8,333 रुपये महीने से अधिक किराया होने पर पैन बताना अनिवार्य कर दिया।

News Posted on: 21-01-2016
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